सभी साथियो को *ईद उल अज़हा* की मुबारकबाद 🌹🌹 दोस्तो ये ईद का पर्व मुस्लिमो के लिए अहम है । ये पर्व गोस्त खाने या खिलाने का पर्व नही है , इसके पीछे है धार्मिक आस्था और बलिदान का अनूठा मिश्रण है। हज़रत इब्राहीम अलेहसलाम को परम पिता परमेश्वर का जब हुकुम हुवा के अपने पुत्र की कुर्बानी दो। तो इब्राहिम अलेहसलाम अपने उस खुदा के हुक्म के मुताबिक अपने पुत्र की कुर्बानी देने को तैयार हो गए। लेकिन खुदा तो सिर्फ दिल को देखता है , खुदा ने उनकी नियत और दिल को देखा और उनके पुत्र की जगह एक मेंढे को लिटा दिया, इस प्रकार कुर्बानी का प्रचलन समाज मे आया । पूरे साल में आप कितने भी जानवर काटो या खाओ लेकिन वो कुर्बानी नही होगी। कुर्बानी सिर्फ साल में एक बार ईद उल अज़हा के तीन दिन में ही होगी।ये ईद स्पष्ठ संकेत देती है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर की रजा के लिए उसका हर बन्दा किसी भी प्रकार के त्याग बलिदान के लिए तैयार है।
दोस्तो कुर्बानी के गोस्त को अमीर व्यक्तिओ या जिनके यहां कुर्बानी हुवी है , वहाँ ना देकर ऐसे लोगो को बांटे जो गरीब हो, जिनके यहां कुर्बानी नही हुई है , और जो हर लिहाज से इसके हक़दार है । अपने माँ बाप ,छोटे भाई बहनों, रिस्तेदारो ,यार दोस्तो से पुरखलुश अंदाज से पेश आये । एक छोटी सी इल्तजा है कि *कुर्बानी का वीडियो या फ़ोटो ना बनाये और न ही किसी मीडिया में पोस्ट करें,क्यूंकि ये सामाजिक और धार्मिक दोनों लिहाज से गलत और गैर शरीयत है*🙏
दोस्तो कुर्बानी के गोस्त को अमीर व्यक्तिओ या जिनके यहां कुर्बानी हुवी है , वहाँ ना देकर ऐसे लोगो को बांटे जो गरीब हो, जिनके यहां कुर्बानी नही हुई है , और जो हर लिहाज से इसके हक़दार है । अपने माँ बाप ,छोटे भाई बहनों, रिस्तेदारो ,यार दोस्तो से पुरखलुश अंदाज से पेश आये । एक छोटी सी इल्तजा है कि *कुर्बानी का वीडियो या फ़ोटो ना बनाये और न ही किसी मीडिया में पोस्ट करें,क्यूंकि ये सामाजिक और धार्मिक दोनों लिहाज से गलत और गैर शरीयत है*🙏
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें