*आतंकवादी*➖जब से होश संभाला तब से ही आतंकवादियो के बारे में सुनता आ रहा हूँ । मेरे मन मे एक धारणा सी बन गयी थी की आतंकवादी कोई राक्षस टाइप का आदमी होगा ,जिसकी शक्ल भयानक होगी, खूंखार दरिंदा नुमा होगा । पर जब tv पर आतंकवादियो के चेहरे मोहरे को देखा तो मुझे नही लगा के ये हम आदमियो से अलग है । कहीं भी कोई बम विस्फोट होता है, बेकसूरों, निहत्थों ,को मारा जाता है तो हम आतंकवादियो के इस घिनोने कृत्य की घनघोर निंदा करते है, और कड़े कदम उठाए जाएंगे का आस्वासन देकर अपनी जिमेदारी से पल्ला झाड़ लेते है , और फिर वो ही कड़ी निंदा को अगला हमला होने तक संभाल कर रख लेते है कि फिर भर्त्सना करने के काम आएगी । कभी फुरसत के लम्हो में आशिक माशूक की दुनिया से अलग हटकर भी सोचा है कि *आखिर ये आतंकवादी बनते क्यूं है? क्या इनका परिवार नही होता? क्यूं जान देना चाहते है और क्यूँ जान लेना चाहते है*❓भई कोई भी बन्दा कितना ही जलीलो खार क्यूँ ना हो ,कितना ही हरामी क्यूं ना हो ,पैसे के लालच में दुसरो की जान लेने को तो राज़ी हो जाएगा परन्तु अपनी जान देने पर कन्नी काट जाएगा क्यूंकि जान है तो जहान है। समझने को तो भौत से उदारण है पर हम बात करते है म्यामांर की हालिया घटना की सारा विश्व समुदाय देख रहा है किस प्रकार शांति के दूत किस प्रकार मुसलमानों की हत्याएं कर रहे है । अब कल्पना कीजिये कि एक परिवार में 6 सदस्यों का शरीफ और खुशहाल परिवार है, और एक दिन उस परिवार के माता पिता भाई बहन और पत्नी को बिना किसी कसूर के निर्दयता के साथ मौत के घाट उतार दिया जाता है ,केवल एक व्यक्ति ही बाकी बचता है । आप उम्मीद करेंगे कि अब उसके जीवन मे उसका टारगेट फिर से मकान बनाना या व्यापार चलाना या जीवन को दुबारा खुशहाल बनाना होगा । निसंदेह आप का जवाब नही होगा । क्यूंकि किसी भी काम में किर्या की प्रतिकिर्या जरूर होती है, आक्रोश को कब तक दबाया जा सकता है । इस लेख का मतलब आतंकवादियो के प्रति हमदर्दी नही है बस एक संदेश है कि मर्ज का कठोर से कठोर इलाज करो परन्तु रोग की जड़ पर वार करो, कोसिस करो के ऐसे हालात ही पैदा ना हो। मारने वाले से बचाने वाले हर धर्म मे बड़ा होता है ,आशु मलिक
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